नई दिल्ली, 10 अप्रैल। दिल्ली सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री, समाजसेवी और भाजपा के प्रमुख नेता राज कुमार आनंद ने कहा कि दलित और वंचित समुदाय के युवाओं को सिर्फ नौकरी मिलने की प्रतीक्षा में न रहकर कोई न कोई कौशल अर्जित कर अपना कारोबार या अध्यवसाय विकसित करना चाहिए, तभी उनका कल्याण हो सकता है। क्योंकि, अब ऐसा कोई चमत्कार नहीं होने वाला है कि कोई आकर उनको उठाएगा। दलित समाज ऊपर उठेगा अपनी समृद्धि से और वह आएगी अपने कौशल और अपनी मेहनत से।
भाजपा नेता आनंद ने यह बात वीरवार को यू-ट्यूब चैनल ‘वायस भारत पॉडकास्ट’ के कार्यक्रम में जिसे मनोज कुमार सिंह होस्ट कर रहे थे। इस पॉडकास्ट में उन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़ने के कारणों पर पहली बार विस्तारपूर्वक चर्चा की। कार्यक्रम की शुरुआत में होस्ट ने जब उनसे उनके बचपन के संघर्षपूर्ण दिनों की चर्चा की तो उन्होंने कहा, मैं दिल्ली में पैदा हुआ। मां-बाप भी गरीब थे। मेरी मम्मी को कोई सिबलिंग नहीं था, न कोई ना भाई-न कोई बहन। इसके कारण मुझे नानी पास रहना पड़ा। वहां भी बहुत गरीबी थी। मेरे पिताजी दर्जी का काम करते थे और मेरे जो नाना कबाड़ी का काम करते थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में बचपन बीता। जब बच्चे स्कूल किताबें लेकर जाते थे, तो उस उम्र में मुझे कुछ मजदूरों के साथ ताले की फैक्ट्री में मजदूरी करने जाना पड़ता था। यह सिलसिला जब मैं नाइंथ में था तब से शुरू हुआ और ग्यारहवीं तक चलता रहा। मैं रात के चौथे पहर ढाई बजे उठता था और दो-तीन घंटे पढ़ाई करने के बाद सुबह साढ़े छह बजे स्कूल के लिए निकल जाता था। दो ढाई बजे स्कूल से लौटता और कुछ खाकर पार्ट-टाइम मजदूरी करने चला जाता था। ताला फैक्ट्री से थके हारे लौटते और नौ बजे तक सो जाना। फिर ढाई बजे उठकर वही दिनचर्या। बचपन के दो साल तो इसी तरह बीते। जब मैं ग्यारहवीं क्लास में था तो मेरी नानी एक दिन रात भर रोती रही। वह कहने लगीं, बेटा अब तू ताले की फैक्ट्री में काम नहीं करेगा। लेकिन, घर का खर्चा भी चलाना था, और भी जिम्मेदारियां थी। फिर मैंने अपने से छोटे बच्चों को साइंस, मैथ्स, इंग्लिश आदि पढ़ाना शुरू किया। उनको ट्यूशन पढ़ा-पढ़ाकर मैंने अपना एमए तक की पढ़ाई का सफर पूरा किया। ये था मेरा बाल्यकाल।
सफल व्यवसायी के रूप में राजधानी में अपनी अच्छी-खासी पहचान बनाने वाले राज कुमार आनंद ने बताया कि उन दिनों अलीगढ़ में जहां उनके नाना का परिवार रहता था, वह स्थान आज भी भीम नगर के नाम से जाना जाता है। तो बाबा साहब का जेहन में होना परिवेशगत और बहुत स्वाभाविक था। कहने का मतलब यह कि बाबा साहेब हमारी बुनियाद में ही शामिल थे। उनके जीवन से हमें विचार के रूप में एक चीज़ मिली, और वह थी ‘पे-बैक टू सोसाइटी’ की अवधारणा। लेकिन पे-बैक टू सोसायटी करने के लिए अपने पास कुछ होना भी तो चाहिए। अब जिसके पास खुद कुछ नहीं है वो क्या पे-बैक करेगा। खैर, हम पढ़े और लेकिन जल्द ही हमें ये समझ में आ गया था कि गांव से हमारी तरक्की का कोई रास्ता नहीं मिलेगा। मैंने आईएएस का इग्जाम भी दिया उसमें मैं फेल हुआ। क्योंकि, कोई कोचिंग लेने की व्यवस्था नहीं थी। पढ़ाई की अन्य सुविधाएं भी कम ही थी, तो यह बात भी जल्द ही समझ में आ गई कि हमे कुछ अपना काम ही करना पड़ेगा। वहीं से रास्ता निकलेगा। अब ये समझिए एमए की पढ़ाई के दौरान मैं कॉलेज में कम और सड़कों पर ज्यादा पाया जाता था। धीरे धीरे छोटे मोटे धंधे शुरू किए। कुछ तो इतने छोटे कि, बताए भी नहीं जा सकते हैं। लेकिन, तभी देश की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का दौर आया। इकोनॉमिक रिफॉर्म्स के उस दौर में कास्ट को कॉस्ट में तब्दील करने की बातें चलने लगी थीं। वह समय अच्छा था जब साउथ एशिया के देश अपने दरवाजे खोल रहे थे तो हमें उसी दौर में एक विंडो मिल। हमने जैसे तैसे कोशिश की और कहीं न कहीं से कुछ व्यवस्था कर हम कोरिया, ताइवान और चीन गए और अपना छोटा-मोटा काम शुरू किया। काम बढ़ा और ठीक-ठाक व्यवसाय हो गया तो उसके बाद ‘पे-बैक टू सोसायटी’ का समय भी आ गया।
उस दौर को याद करते हुए पूर्व मंत्री ने कहा, ‘पे-बैक टू सोसाइटी’ के लिए राजनीति एक बहुत अच्छा जरिया है। राजनीति शास्त्र से ही मैंने एमए किया भी था। सो, लगातार दिमाग में यह बात चलती रहती थी कि देश की राजनीति बहुत खराब है। उसी दौर में अचानक एक दिन मेरे फोन पर मैसेज आया कि अन्ना हज़ारे जी देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन जा रहे हैं और आपको जाना है, उसके लिए आप एक्सेप्ट करिए। मैंने उसको खुद एक्सेप्ट किया और अपने दोस्तों से भी कराया। हम लोग वहां गए तो वहां हमने महसूस कि इससे देश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन की व्यवस्था हो सकती है। ‘आईडिया ऑफ इंडिया’ जिसका सपना आजादी से पहले हमारे महापुरुष देखते थे, उससे जुड़ाव हुआ। उसके बाद अचानक एक दिन अरविंद केजरीवाल ने कहा, राजनीति में उतरे बिना राजनीति को साफ नहीं किया जा सकता है। उन्होंने नारा दिया, ‘बदलेगी राजनीति-बदलेगा देश’। उससे मैं कनेक्ट हुआ। मैने कहा, ये तो सही है, राजनीति बदलेगी तो देश बदलेगा। अरविंद केजरीवाल से मेरा कनेक्शन हो गया। 2012 में 2013 का एलेक्शन था। 2012 में टिकटों की बात चल रही थी तब उन्होंने मुझसे कहा कि आपको लड़ना पड़ेगा। मैंने कहा, मैं तो नहीं लड़ सकता, मेरे बच्चे हैं छोटे। लेकिन, उनके बहुत कहने पर हमने अपनी पत्नी को यहीं पटेल नगर से इलेक्शन लढ़वाया। 2013 में वो जीतीं और पहली सीट आम आदमी पार्टी के लिए निकाल कर दीं। 2018 में अरविंद केजरीवाल जी ने फिर बुलाया कि नहीं फिर दोबारा पार्टी में आओ। उन्होंने बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहां कम से कम सात-आठ हज़ार लोग थे। उनने कहा कि हम दिल्ली मिलकर चलाएंगे। बहरहाल, 2020 का चुनाव मैंने लड़ा। फिर जनता का बहुत प्यार मिला। पटेलनगर के लोगों ने तैतीस हजार वोट से जिताया।
कोविड में जब सारे नेता घरों के अंदर बंद थे। मैं हेल्थ सेंटर चला रहा था, घर-घर जा कर सैनिटाइजेशन किया। जरूरतमंद लोगों तक खाना भी पहुंचाया। ये तमाम चीज़ें कोविड में की तो मैं काफ़ी उन दिनों काफ़ी पॉपुलर हुआ। अरविंद केजरीवाल जी ने मुझे मंत्री बना दिया। एक समय तो ऐसा भी आया जब मेरे पास चौदह मंत्रालय हो गए थे। सात मंत्रालय तो मेरे पास शुरू से अंत तक रहे जिसमें लेबर था, सोशल वेलफेयर था, एससी-एसटी था और कोऑपरेटिव्स था। जब तक विधायक था, तब तक तो सब ठीक चल रहा था लेकिन जब मैं मंत्री बना। मुझे अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों के ज़्यादा नज़दीक जाने का अवसर मिला। और तब मैने महसूस किया कि जो हमारा नारा था कि, बदलेगी राजनीति-बदलेगा देश, वैसा तो कुछ नहीं हो रहा। देश तो बदला नहीं, राजनीति भी नहीं बदली। ये लोग जरूर बदल गए थे। जब जब मैं बात करता था दलित कल्याण की, जब जब मैं बात करता था दलितों की बस्तियों में सुधार की, तब मुझे साइडलाइन कर दिया जाता था। यह बात मुझे छूती थी। और भी अनेक बातें हुई। जैसे राज्यसभा में दस लोग पंजाब से और तीन दिल्ली से, कुल तेरह लोग भेजे गए, जिनमें एक भी दलित को नहीं लिया गया। आम आदमी पार्टी बाबा साहेब और शहीद भगत सिंह की फोटो रखकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है, हर प्रोग्राम की शुरुआत करती है। मुझे लगा कि ये सब नकली है, ये ढोंग है। तो मेरा मोहभंग इस तरह से उस पार्टी से हुआ। स्वाती मालीवाल को जब महिला आयोग के अध्यक्ष पद से हटाया गया था, तब मैंने कहा था कि किसी दलित महिला को महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। क्योंकि, ज्यादातर महिलाएं जिन पर अत्याचार होते हैं, वे दलित वर्ग और वंचित वर्ग से ही होती हैं। इस बारे में मैने अखबारों में इंटरव्यू भी दिए। और भी कई प्रकरण इस तरह के थे। मैंने खुद कहा कि बोध गया के लिए, महर्षि वाल्मीकि के स्थान के लिए ट्रेन चलाई जाए, लेकिन कोई सुनने वला नहीं था।
देखिए, अरविंद केजरीवाल को जहां तक मैने समझा, वो जो उनकी पॉलिटिक्स थी, वह हिट एंड रन की पॉलिटिक्स थी। कहीं कोई घोषणा की और किसी पर ब्लेम लगाकर कि ये नहीं कर रहा, मैंने तो कर दिया था और बैठ गए। उनकी राजनीति की शुरुआत भी इसी तरह हुई थी। कहते थे, शीला दीक्षित को जेल भिजवा दूंगा, धीरू भाई अंबानी को जेल भिजवा दूंगा, फलाना को जेल भिजवा दूंगा, पूरी फाइल लेकर तैयार रहते थे। और हुआ क्या, किसको भिजवाया जेल? यही हिट एंड रन है। असल में उनका जोर सिर्फ पार्टी के प्रचार पर रहता था कि कैसे पैन इंडिया लेवल पर पार्टी फैल जाए। दिल्ली को तो अपनी जरखरीद मानते थे। कहा था न, कि इस जन्म में तो मोदी दिल्ली में नहीं आ सकते। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जी के प्रकरण में बहुत गलत हुआ था।
राघव चड्ढा मामले के बारे में पूछने पर, पूर्वमंत्री प्रति प्रश्न करते है कि अब राघव चड्ढा की क्या गलती है? एक सीए था, एक रुपये की सैलरी पर उसने काम किया। सबका अपना-अपना ढंग होता है, अपने-अपने सब्जेक्ट होते हैं। संसद में सब अपने-अपने हिसाब से दिल्ली की समस्याओं को उठाते हैं। लेकिन यह क्या कि, एक दिन अचानक आपने कह दिया उप सभापति को कि साहब! इनको समय नहीं देना! यह डिक्टेटरशिप है, उस पार्टी में उनकी डिक्टेटरशिप ही चल रही है।
एक प्रश्न के उत्तर में राजेन्द्र कुमार आनंद ने कहा कि, संविधान सभा में बाबा साहब का अंतिम भाषण सभी को याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा था कि यह संविधान जब लागू होगा, उस दिन से हर व्यक्ति के वोट की कीमत एक बराबर होगी। चाहे राजा हो, रंक हो, स्त्री हो, पुरुष हो सबके वोट की ताकत बराबर है। संविधान के जरिए बाबा साहेब ने रानी के पेट का ऑपरेशन कर दिया था, कि राजा अब रानी के पेट से नहीं, पब्लिक के वोट से पैदा होगा। लेकिन, उन्होंने एक बात सरकारों को चेताते हुए भी कही थी, कि जो सामाजिक और आर्थिक खाई है, उनको पाटने का काम आने वाली सरकारों को करना है। लेकिन, 75 साल तक क्या होता रहा? प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जी आए 2014 में। उसके बाद धीरे धीरे ग्यारह-बारह साल में आपने देखा कि किस तरह से 27 करोड़ लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाया गया। दलित, वंचित, शोषित, पिछड़े वर्ग के लोगों को ऊपर उठाया जा रहा है। योजनाए जो लागू हुई हैं, अगर कोई ये कहता है कि इसमें कोई पार्सियलिटी हुई है तो वह बिल्कुल गलत है। योजनाओं का लाभ गरीबों को ही ज़्यादा मिलता है।





