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सुख को बांटने से ही मिलता है संतोष: साध्वी ऋतंभरा 

लाला पन्नालाल स्मृति व्याख्यानमाला के तहत सेमिनार का आयोजन 

नई दिल्ली, 16 मार्च। सनातन मूल्यों की प्रबल पैरवीकार एवं जन-जन तक भारतीय संस्कृति, सामाजिक मूल्यों के प्रति समग्र जागृति लाने के मिशन में जुटी संस्था ‘चेतना’ (सुरभि सनातन की) की ओर से रविवार, 15 मार्च को रोहिणी सेक्टर 25 में स्थित इस्कॉन मंदिर में लाला पन्नालाल सिंघल स्मृति व्याख्यान माला (10.0) के तहत 76 वें सेमिनार का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता के रूप में श्रीराम मंदिर निर्माण आंदोलन की अग्रणी ध्वजवाहक, नारी सशक्तीकरण की नई परिभाषा लिखने वाली, ‘वात्सल्य ग्राम’ की संस्थापक और

पद्मभूषण साध्वी ऋतंभरा रहीं। उन्होंने अपने भावपूर्ण, ओजपूर्ण संबोधन में सेमिनार की मुख्य थीम ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ पर इतने धाराप्रवाह से अपनी बात रखी कि उपस्थित सभी गणमान्य अतिथि व दर्शक भावनाओं के सागर में गोते लगाते नजर आए। उन्होंने कहा कि सुख को बांटने से ही संतोष मिलता है, यही तो ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ है। अकेले कभी सुख का अहसास नहीं होता। मंदिर का प्रसाद नारी शक्ति किस प्रकार ग्रहण करती है। वह अपने पल्लू में उसे बांध लेती है, फिर घर आकर प्रसाद का एक-एक दाना परिवार के सभी सदस्यों को वितरित करती है। यह दृश्य और अहसास कितना आनन्ददायक है, यही ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’है। 

साध्वी ऋतंभरा ने एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा कि किसी को सुखी, तृप्त, तनाव रहित देखकर ऐसा भाव आता है जो आंखों से पानी के रूप में छलक उठता है। परहित के लिए ऐसी भावना रखने वाले को प्रभु भक्ति के लिए अर्घ्य देने की आवश्यकता नहीं होती, वह अर्घ्य तो आंखों से प्रवाहित हो चुका। 

साध्वी ऋतंभरा ने संत नामदेव का उदाहरण देते हुए विनम्रता धारण करने का संदेश दिया। पड़ोस में दुख है, संकट है, व्याकुलता है तो अपने घर में व्यंजन नहीं बनता, यही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ है। परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र सभी को अपना मानना है।

मानव का हृदय कूप या कुएं जैसा होना चाहिए, वो कुआं जिसका जल अनंत जलस्रोत से जुड़ा होता है, कभी खाली नहीं होता, कभी खत्म नहीं होता।

साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि सनातनियों को जड़ में भी चेतन का अहसास हो जाता है। यही वसुधैव कुटुंबकम् की प्रबल भावना है। अपनों के अवगुणों की मिट्टी हटा कर गुणों को ढूंढ़िये। जैसे मनों (मापन) मिट्टी में केवल एक या दो सोने के कण मिलते हैं, उसी प्रकार मानव के एक-एक गुण को ढूंढ़ना, उसका शुद्धिकरण करना, उसे तराशना भी ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ संदेश का हिस्सा है। “अहम में वयम्, मैं में हम, व्यष्टि में सृष्टि” ही सनातन का मूल आधार है।

हर पनघट मेरा पनघट है

हर गागर मेरी गागर है॥

साध्वी ऋतंभरा ने रोचक अंदाज में एक बहू का भी जिक्र किया जिसने एक अवसर पर दूरगामी संदेश वाली बात कही लेकिन उसके ससुर ने उसका उल्टा अर्थ समझ लिया। बाद में ससुर व पूरे परिवार ने बहू के महत्व को माना। पिछले जन्म के पुण्यों का लाभ इस जन्म में ले रहे हैं तो वह बासी है। इसी जन्म के कर्मों का ताजा पुण्य लाभ लेने की आदत डालनी होगी। हर व्यक्ति अपने आप में एक संस्था है। साध्वी ऋतंभरा ने अपने संबोधन के दौरान संस्था ‘चेतना’ और इसके अध्यक्ष राजेश चेतन की बार-बार मुक्तकंठ से प्रशंसा की।

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