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जाने माने जर्मन दार्शनिक युर्गेन हाबरमास का निधन

बर्लिन, 15 मार्च। दुनिया भर में प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक और चिंतक युर्गेन हाबरमास का 96 साल की आयु में निधन हो गया है।वे जर्मनी के शहर म्यूनिख के पास स्थित श्टानबेर्ग कस्बे में रहते थे. यहीं उन्होंने अपनी जिंदगी के कई दशक बिताए। हाबरमास 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली विचारकों में गिने जाते थे। उम्र के आखिरी सालों तक भी वह सक्रिय रहे और जर्मनी में ऐसे कुछ बुद्धिजीवियों में थे जो राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते थे।

जब 2015 में लाखों लोग अपने देशों में जारी युद्ध से भाग कर यूरोप में शरण लेने पहुंचे, तब हाबरमास ने शरण के अधिकार का समर्थन किया था। वे यूरोप की एकता के भी समर्थक थे और राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ खुलकर बोलते थे। उनका सपना ऐसा लोकतंत्र था जो खुला हो, मजबूत हो और पूरी दुनिया के लोगों को जोड़ने वाला हो।

साल 2018 में उन्हें जर्मन-फ्रेंच मीडिया पुरस्कार से नवाजा गया। 90 साल की उम्र के बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र के इतिहास पर दो खंडों में 1700 पन्नों का ग्रंथ भी लिखा, जिसका नाम था ‘दिस टू अ हिस्ट्री ऑफ फिलॉसफी’। इसमें इंसानी दिमाग और तर्क के क्रमिक विकास की कहानी बताई गई है।

अपने जीवन में उन्हें कई बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। साल 2007 में उन्हें पांच लाख यूरो से ज्यादा की राशि वाला प्रतिष्ठित होलबेर्ग अंतरराष्ट्रीय स्मृति पुरस्कार भी दिया गया। बाद में साल 2021 में उन्हें संयुक्त अरब अमीरात से एक पुरस्कार मिला, जिसकी राशि दो लाख पच्चीस हजार यूरो थी। उन्होंने बाद में वह पुरस्कार यह कहकर ठुकरा दिया कि वहां की व्यवस्था उनके विचारों के विपरीत है और इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत कमजोर पड़ते हैं।

युर्गेन हाबरमास का जन्म 1929 में जर्मनी के ड्यूसलडोर्फ शहर में हुआ था। युवावस्था से ही वे समाज पर सवाल उठाया करते थे। उन्होंने दर्शन, अर्थशास्त्र और जर्मन साहित्य की पढ़ाई की और शुरुआत में एक फ्रीलांस पत्रकार के रूप में काम किया।

साल 1954 में उन्होंने दर्शन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1961 में लिखी उनकी पोस्ट डॉक्टरल थीसिस 1989 में ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’ के शीर्षक से अंग्रेजी में छपी। इसमें बताया गया कि लोकतांत्रिक समाजों में जनमत और सार्वजनिक चर्चा का कितना महत्व है। यह काम आज भी बहुत प्रभावशाली माना जाता है।

उनके सिद्धांत एक मजबूत और खुले लोकतंत्र को बढ़ावा देते हैं। माना जाता है कि 1968 के छात्र आंदोलनों पर उनका असर पड़ा। लेकिन जब छात्र उन्हें एक तरह से अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानने लगे, तब हाबरमास ने उस आंदोलन के उन कट्टर विचारों से दूरी बना ली, जो रेड आर्मी फ्रैक्शन जैसे आतंकवादी तरीकों का समर्थन करते थे।

1971 में हाबरमास म्यूनिख के पास श्टार्नबेर्ग चले गए और वहां नए मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के सह-निदेशक बने। वहीं उन्होंने अपनी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण किताब प्रकाशित की : ‘थ्योरी ऑफ कम्यूनिकेटिव एक्शन’, जो दो भागों में थीं। इसमे उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की बुनियाद भाषा और आपसी संवाद पर होनी चाहिए। उनके मुताबिक अगर लोग खुलकर बहस करें और सोच-समझकर जनमत बनाएं, तभी समाज में असली प्रगति हो सकती है।

बाद में उन्होंने इन विचारों को यूरोपीय संघ (ईयू) पर भी लागू किया। उन्हें उम्मीद थी कि यूरोपीय संघ राष्ट्रवाद के खिलाफ एक लोकतांत्रिक सुरक्षा दीवार बन सकता है। 2017 में बर्लिन में “यूरोप का भविष्य क्या होगा?” नाम के एक फोरम में उन्होंने कहा कि उन्हें डर है कि यूरोप का यह प्रोजेक्ट आम लोगों को मजबूत बनाने के बजाय सिर्फ अभिजात लोगों के हाथ में न रह जाए। उन्होंने कहा,  “यूरोप की एकता ज्यादातर एलीट लोगों का प्रोजेक्ट बनी रही है, क्योंकि राजनेताओं ने आम जनता को भविष्य के अलग-अलग विकल्पों पर समझदारी से बहस में शामिल नहीं किया।”

1983 में युर्गेन हाबरमास फिर से फ्रैंकफर्ट लौटे। वहां उन्होंने 1994 में रिटायर होने तक दर्शनशास्त्र पढ़ाया. लेकिन रिटायर होने के बाद भी वे सामाजिक और राजनीतिक बहसों पर अपना असर डालते रहे।

उदाहरण के लिए, 1999 में उन्होंने कोसोवो युद्ध को खत्म करने के लिए सर्बिया पर नाटो की बमबारी का समर्थन किया। उनका कहना था, “अगर कोई और रास्ता न बचे, तो लोकतांत्रिक पड़ोसी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वैध आपात सहायता के रूप में जल्दी हस्तक्षेप करने में सक्षम होना चाहिए।”

यूरोपीय एकता के समर्थक होने के बावजूद, हाबरमास बार-बार यूरोपीय संघ में लोकतांत्रिक कमियों की ओर इशारा करते रहे। 2010 के दशक की यूरो संकट के दौरान उन्होंने बहुत सख्त आर्थिक कटौतियों के खिलाफ चेतावनी दी और सुझाव दिया कि मुद्रा संघ को बढ़ाकर एक “सुपरनेशनल” लोकतंत्र बनाया जाए, जिसमें देश और ज्यादा अपनी संप्रभुता छोड़ें।

हाबरमास का जन्म कटे हुए होंठ के साथ हुआ था और बचपन में दूसरे बच्चे उन्हें चिढ़ाते थे। उनके जीवनी लेखक श्टेफान म्युलर-डूम के मुताबिक शायद इसी वजह से हाबरमास को पूरी जिंदगी संवाद और संचार के विषय में गहरी दिलचस्पी रही।

90 साल की उम्र पार करने के बाद भी वह काम करते रहे। उनके काम पर लिखी गई किताबें, लेख और शोध-प्रबंध मिलाकर 14,000 से ज्यादा हो चुके हैं। टाइम्स हायर एजुकेशन गाइड ने उन्हें मानविकी और सामाजिक विज्ञानों में सातवां सबसे ज्यादा उद्धृत लेखक बताया। 1999 में सौरमंडल के किनारे खोजे गए एक क्षुद्रग्रह का नाम भी उनके नाम पर रखा गया। इसका मतलब है कि मौत के बाद भी उनका सितारा चमकता रहेगा।

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